रज़ा आपो हवे दादा
छोटा सा सम्मान
ये कहानी इक ऐसे व्यक्ति की है
जो एक फ्रीजर प्लांट में काम करता था ।
वह दिन का अंतिम समय था व् सभी घर जाने
को तैयार थे तभी प्लांट में एक
तकनीकी समस्या उत्पन्न
हो गयी और वह उसे दूर करने में जुट गया ।
जब तक वह कार्य पूरा करता तब तक अत्यधिक देर
हो गयी ।
दरवाजे सील हो चुके थे व्
लाईटें बुझा दी गईं ।
बिना हवा व् प्रकाश के
पूरी रात आइस प्लांट में फसें रहने
के कारण
उसकी बर्फीली कब्रगाह
बनना तय था ।
घण्टे बीत गए तभी उसने
किसी को दरवाजा खोलते पाया ।...
क्या यह इक चमत्कार था ?
सिक्यूरिटी गार्ड टोर्च लिए खड़ा था व् उसने उसे
बाहर निकलने में मदद की। वापस आते समय उस
व्यक्ति ने सेक्युर्टी गार्ड से पूछा "आपको कैसे
पता चला कि मै भीतर हूँ ?" गार्ड ने उत्तर दिया "
सर, इस प्लांट में 50 लोग कार्य करते हैँ पर सिर्फ एक आप हैँ
जो सुबह मुझे नमस्कार व् शाम को जाते समय फिर मिलेंगे कहते हैँ ।
आज सुबह आप ड्यूटी पर आये थे पर शाम
को आप बाहर नही गए । इससे मुझे शंका हुई और
मैं देखने चला आया ।
वह
व्यक्ति नही जानता था कि उसका किसी को छोटा सा सम्मान
देना कभी उसका जीवन बचाएगा ।
याद रखेँ, जब भी आप किसी से मिलते
हैं तो उसका गर्मजोश मुस्कुराहट के साथ सम्मान करें । हमें
नहीं पता पर हो सकता है कि ये आपके
जीवन में भी चमत्कार दिखा दे ।
कॉपी पेस्ट हैं अच्छा लगे तो आगे बढ़ाये
जात पात और छुआछुत
मातृभाषा का सम्मान
दोस्तों ओबामा ने हिन्दी मे नमस्ते किया, इसपर आपको एक किस्सा सुनाता हूँ ******:
स्वामी विवेकानंद जी भाषण देने के लिये अमेरिका गये.
संचालक हाथ आगे बढ़ाते हुए बोले: हेलो..
तो विवेकानंद जी ने, हाथ जोड़कर नमस्ते की...
संचालक को लगा की शायद इन्हे इंग्लीश नही आती तो बोले: नमस्ते, सर कैसे हैं आप?
तो विवेकानंद जी बोले: आइ अम फाइन, थॅंक यू.....
संचालक चकरा गया ओर पूछने लगा की जब मैने इंस्लिश मे बात की तो आपने हिन्दी मे जवाब दिया ओर जब मैने हिन्दी मे तो आपने इंग्लीश मे जवाब दिया, ऐसा क्यों.. ?? तो
विवेकानंद जी बोले: जब आपने अपनी मातृ भाषा का सम्मान किया तो मैने अपनी मातृ भाषा का सम्मान किया ओर जब आपने मेरी मातृ भाषा का सम्मान किया तो मैने आपकी मातृ भाषा का सम्मान किया......
जय हिन्द... वन्देमातरम...
बाज का पुनर्स्थापन
बाज लगभग ७० वर्ष जीता है,
परन्तु अपने
जीवन के ४०वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।
उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं-
पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व
शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।
चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।
पंख भारी हो जाते हैं,
और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते
हैं।
भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना, तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं।
उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं, या तो देह त्याग दे,
या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह
त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे...
या फिर स्वयं को पुनर्स्थापित करे,
आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
वहीं तीसरा अत्यन्त
पीड़ादायी और लम्बा।
बाज पीड़ा चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।
वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है,
एकान्त में अपना घोंसला बनाता है, और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।
सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..
अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के
लिये। तब वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने की।
उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने
की।
नये चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।
१५० दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा...
और तब उसे
मिलती है वही भव्य और
ऊँची उड़ान, पहले
जैसी नयी।
इस पुनर्स्थापना के बाद वह ३० साल और जीता है,
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।
प्रकृति हमें सिखाने बैठी है-
पंजे पकड़ के प्रतीक हैं, चोंच सक्रियता की, और पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।
इच्छा परिस्थितियों पर
नियन्त्रण बनाये रखने की,
सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की,
कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने
की।
इच्छा, सक्रियता और कल्पना,
तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं,
हममें भी, चालीस तक आते आते।
हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने
लगता है, अर्धजीवन में
ही जीवन समाप्तप्राय सा लगने लगता है,
उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा अधोगामी हो जाते हैं।
हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं-
कुछ सरल और त्वरित,
कुछ पीड़ादायी।
हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे
अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा-बाज के पंजों की तरह।
हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र
मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित
सक्रियता दिखानी होगी-बाज की चोंच की तरह।
हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के
भारीपन को त्याग कर
कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने
भरनी होंगी-बाज के
पंखों की तरह।
१५० दिन न सही, तो एक माह
ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में। जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही,
बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे, इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी।
माँ
एक बार एक शहरी परिवार मेले मेँ घुमने
गया, मेले मेँ 1 घंटे तक घुमे
कि अचानक उनका बेटा मेले मेँ
खो गया,
दोनो पति-पत्नी ने मेले मेँ बहुत ढ़ुढ़ते
है, लेकिन लङका नही मिलता है,
लङके कि माँ जोर-जोर से रोने
लगती है, बाद मेँ पुलिस को सुचना देते
है,
आधे घण्टे बाद लङका मिल जाता है,
लङके के मिलते ही उसका पति गाँव
का टिकिट लेकर आता है,और वो सब बस
मेँ बेठ कर गाँव रवाना हो जाते है,
तभी पत्नी ने पुछा: हम गाँव
क्यो जा रहे है, अपने घर नही जाना है
क्या...?
तभी उसका पति बोला:"तु तेरी औलाद
के बिना आधा घण्टा नही Rah
सकती,तो मेरी माँ गाँव मेँ पिछले 10
साल से मेरे बिना कैसे
जी रही होगी..??
सुकून भरी मौत
मैं तकरीबन 20 साल के बाद अपने शहर लौटा था! बाज़ार में घुमते हुए सहसा मेरी नज़रें सब्जी का ठेला लगाये एक बूढे पर जा टिकीं, बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं उसको पहचान नहीं पा रहा था !
लेकिन न जाने बार बार ऐसा क्यों लग रहा था की मैं उसे बड़ी अच्छी तरह से जनता हूँ !
मेरी उत्सुकता उस बूढ़े से भी छुपी न रही , उसके चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैं समझ गया था कि उसने मुझे पहचान लिया था !
काफी देर की जेहनी कशमकश के बाद जब मैंने उसे पहचाना तो मेरे पाँव के नीचे से मानो ज़मीन खिसक गई !
इसकी एक बहुत बड़ी आटा मिल हुआ करती थी नौकर चाकर आगे पीछे घूमा करते थे ! धर्म कर्म, दान पुण्य में सब से अग्रणी इस दानवीर पुरुष को मैं ताऊजी कह कर बुलाया करता था !
वही आटा मिल का मालिक और
आज सब्जी का ठेला लगाने पर मजबूर?
मुझसे रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और बहुत मुश्किल से रुंधे गले से पूछा :
"ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया?"
भरी ऑंखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख उसने उत्तर दिया:-
"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटा".
उन महानुभाव ने अपनी बात कह दी थी अब सोचने की बारी हमारी है जिन्होंने हमें खुशनुमा जीवन दिया क्या उनको हम सुकून भरी मौत भी नही दे सकते?
हिंदी और उर्दू के शब्द
ये हैं वो उर्दू के शब्द जो हम प्रतिदिन प्रयोग
करते हैं,और बहुत आसानी से हम इनके जगह हिंदी के शब्द प्रयोग कर सकते हैं, इन विदेशी शब्दों को त्याग कर
मातृभाषा का प्रयोग करें:-
ईमानदार - निष्ठावान
इंतजार - प्रतीक्षा
इत्तेफाक - संयोग
सिर्फ - केवल
शहीद - बलिदान
यकीन - विश्वास, भरोसा
इस्तकबाल - स्वागत
इस्तेमाल - उपयोग, प्रयोग
किताब - पुस्तक
मुल्क - देश
कर्ज - ऋण
तारीफ - प्रशंसा
इल्ज़ाम - आरोप
गुनाह - अपराध
शुक्रिया - धन्यवाद
सलाम - नमस्कार
मशहूर - प्रसिद्ध
अगर - यदि
ऐतराज - आपत्ति
सियासत - राजनीति
इंतकाम - प्रतिशोध
इज्जत - सम्मान
इलाका - क्षेत्र
एहसान - आभार, उपकार
अहसानफरामोश - कृतघ्न
मसला - समस्या
इश्तेहार - विज्ञापन
इम्तेहान - परीक्षा
कुबूल - स्वीकार
मजबूर - विवश, लाचार
मंजूरी - स्वीकृति
इंतकाल - मृत्यु
बेइज्जती - तिरस्कार
दस्तखत - हस्ताक्षर
हैरान - आश्चर्य
कोशिश - प्रयास, चेष्टा
किस्मत - भाग्य
फैसला - निर्णय
हक - अधिकार
मुमकिन - संभव
फर्ज - कर्तव्य
उम्र - आयु
साल - वर्ष
शर्म - लज्जा
सवाल - प्रश्न
जबाब - उत्तर
जिम्मेदार - उत्तरदायी
फतह - विजय
धोखा - छल
काबिल - योग्य
करीब - समीप, निकट
जिंदगी - जीवन
हकीकत - सत्य
झूठ - मिथ्या
जल्दी - शीघ्र
इनाम - पुरस्कार
तोहफा - उपहार
इलाज - उपचार
हुक्म - आदेश
शक - संदेह
ख्वाब - स्वप्न
तब्दील - परिवर्तित
कसूर - दोष
बेकसूर - निर्दोष
कामयाब - सफल
गुलाम - दास
और भी अन्य सैंकड़ों उर्दू के शब्द जो हम प्रयोग
में लेते हैं।
जांच करें कि आप कितने उर्दू के शब्द बोलते है।
हिन्दी बोलने का प्रयास करें!!!!
धन्यवाद !!
#वन्देमातरम
#जनजागृति_हेतु_शेयर_जरुर_करे…
धर्म क्या है? क्या मंदिर जाना चाहिए?
10वी पास हुए अभी ज्यादा दिन नही हुए थे,और ये समय घर परिवार से मनमुटाव का होता है, और एसे समय में एक दोस्त मिला। उसने बार बार ,हर दिन एक बात मेरे दिमाग में भरने का काम किया की पिताजी मतलब एटीएम मशीन , और माताजी मतलब मेस जहाँ से खाना मिलता है।
10वी तक मैं बहुत ही धार्मिक किस्म का लड़का था। मेरा आचरण सोच बहुत अच्छी थी, प्रतिदिन अपने समय का एक बड़ा हिस्सा धर्म क्रियाओ में जाता था। मंदिर जाना, रोज पूजा करना इत्यादि। पर अब तो मुझे दोस्त मिल गया था। अब मेरी सोच बदल रही थी, धर्म ध्यान पूजा पाठ मुझे फालतू लगने लगा था। इसी बिच 12वी पास हो गया।
अब इस साल मुझे मेरे पसंद के महाविद्यालय में प्रवेश नही मिला।(और बाद में भी मुझे मेरी पसंद बदलनी पड़ी)
अब मैंने एक साल तैयारी करने की सोची। इस साल मेरे पास सोचने के लिए बहुत समय था क्युकी मेरे पास काम कुछ नही था, और मेरा खाली दिमाग शैतान का घर हो गया। अब मैं धर्म को ले कर तर्क कुतर्क करना शुरू कर दिया था। अब मेरे लिए धर्म का मतलब गरीब को रोटी खिलाना था। किसी दिन वृधाश्रम में जा के सेवा करना था। अब मुझे मेरी सोच पर गर्वहोता था और घर वालो की सोच पसंद नही आती थी।
इसी समय विवेकान्द जी की बात पढने में आई और बस अब सच में मेरे लिए मंदिर मिठाई चढ़ाना पाप हो गया। ख़ुशी है मुझे इन सब बातो से की कम से कम इस बिच मैंने खुद से बात करना सिख लिया था मैंने खुद की सोच, खुद की एक विचारधारा बनानी शुरू की थी। और इन सब में सबसे अच्छी बात यही थी। इसी बिच मेरे engg में प्रवेश के दिन आ गये। और एक engg के महाविद्यालय में मेरा प्रवेश शुरू हुआ।
पहले दो साल हंसी मस्ती पढाई लिखाई में निकल गये। सवेरे दोपहर शाम और रात अब सब कुछ दोस्तों के साथ होता था।तीसरा साल में मैं कुछ रिश्तेदारों के साथ रहता था। अब दोस्तों से मिलना कम हो गया और खुद के लिए समय मिलना फिर शुरू हुआ।
अब पहले से कुछ ज्यादा परिपक्वता आने लगी थी। अब एक दिन मैंने सोचा की यार गरीब को खाना खिलाना अच्छी बात है, और वृधाश्रम में जा के सेवा करना धर्म है, ये बात समझ आ गई है पर अमल में नही।
उस दिन चिंतन चला और एक निर्णय लिया कि उस दिन मंदिर जाना और पूजा पाठ करना बंद कर दूंगा जिस दिन से मैं रोज वृधाश्रम जाना और गरीबो की सेवा शुरू कर दूंगा ।
अफ़सोस इस बात का है उस दिन के बाद से आज तक सिर्फ एक बार वृधाश्रम गया हूँ, और किसी दिन गरीब को खाना खिलाया ऐसा याद नही।
अब कुछ दिनों बाद दिमाग में एक बात आई की क्यों मेरे दिमाग में वृधाश्रम और गरीब आये? क्यों उनकी सेवा और उनकी भूख के बारे में सोचा मैंने?
इस बात को आप लोग भी सोचिये अगर ये बात आपके मन में भी है तो...
इसका जवाब निचे कमेंट(टिप्पणी) में लिखा हुआ है
बहन होनी चाहिए
कैसी भी हो एक
बहन होनी चाहिये..........।
.
बड़ी हो तो माँ- बाप से बचाने
वाली.
छोटी हो तो हमारे पीठ पिछे छुपने
वाली..........॥
.
बड़ी हो तो चुपचाप हमारे पाँकेट मे
पैसे रखने वाली,
छोटी हो तो चुपचाप पैसे निकालके
लेने वाली.........॥
.
छोटी हो या बड़ी, छोटी-
छोटी बातों पे
लड़ने वाली,एक बहन
होनी चाहिये.......॥
.
बड़ी हो तो ,गलती पे हमारे कान
खींचने वाली,
छोटी हो तो अपनी गलती पर,साँरी भईया कहने
वाली...
खुद से ज्यादा हमे प्यार करने
वाली एक बहन होनी चाहिये.... ....॥
खुश हूँ
एक कविता,
चंद पंक्तियाँ,
बिना कठिन शब्दों के,
पर एक ऐसा कठिन कार्य कर सकने वाली,
जो सिर्फ आध्यात्मिक लोगो के बस का है।
जो कभी कभी महाज्ञानी भी नही कर पाते
जिंदगी है छोटी, हर पल में खुश हूं
काम में खुश हूं, आराम में खुश हू
आज पनीर नहीं, दाल में ही खुश हूं
आज गाड़ी नहीं, पैदल ही खुश हूं
दोस्तों का साथ नहीं, अकेला ही खुश हूं
आज कोई नाराज है, उसके इस अंदाज से ही खुश हूं
जिस को देख नहीं सकता, उसकी आवाज से ही खुश हूं
जिसको पा नहीं सकता, उसको सोच कर ही खुश हूं
बीता हुआ कल जा चुका है, उसकी मीठी याद में ही खुश हूं
आने वाले कल का पता नहीं, इंतजार में ही खुश हूं
हंसता हुआ बीत रहा है पल, आज में ही खुश हूं
जिंदगी है छोटी, हर पल में खुश हूं
अगर दिल को छुआ, तो जवाब देना
वरना बिना जवाब के भी खुश हूं।
प्यार तुम्ही से करते है...
- हम प्यार तो उन्ही से....
हम प्यार तो उन्ही से करते है;
पर अब ये जताना छोड़ दिया;
हम उनसे कभी रूठे ही नहीं;
और उसने भी मनाना छोड़ दिया;
मरना भी मुश्किल है, जिस शख्श के बगैर्;
उस शक़्स् ने ख्वाबो में भी आना छोड़ दिया;
ऱोना तो कभी हमें आता ही ना था;
पर अब हमने मुस्कराना छोड़ दिया;
सब पूछ्ते है कि हम क्यों लिखते नहीं;
कैसे कहे कि ज़ख्मो को कागज़ पे सजाना छोड दिया।
यश, उसका ख्याल रखना।
बड़ी बहन कई साल बाद मुझे मिली थी। 2साल उनके साथ रहा, वो बिलकुल वैसी थी जैसी मैं चाहता था। दोस्त भी थी डांटती भी थी समझाती भी थी मदद भी करती थी प्यार भी करती थी ख्याल रखती थी.....
ये लिखते वक्त सबसे बड़ा दर्द "थी"लिखने में हो रहा है, काश ये "थी" शब्द मेरे जिंदगी का "है" हो जाता हमेशा के लिए।
काश मेरी जिंदगी से ये "काश" हट जाता हमेशा के लिए....
पर वो मेरी दीदी होने के साथ साथ की और की भी बड़ी बहन थी और उसे ये पसंद नही था की मुझे ये सब उसकी बहन से मिले। उसे लगा की मैं उसका हक छीन रहा हूँ।
और इस कारण वह चिढने लगा मुझसे भी और दीदी से भी। मुझसे वो कितना भी चिढ़े मुझे मंजूर था.... पर मैं उन दोनों बिच में नही आना चाहता था। सो मुझे ही हटना पड़ा। बहुत कठिन था।
घर में आने की ख़ुशी वही थी बस अब छुपाना पड़ता था,
दीदी के सवाल का रुखा सा उत्तर दे के निकल जाना पड़ता था,
दीदी सामने बैठी हो पर उनको देख के मुस्कुरा भी नही सकता था,
अक्सर अब दीदी के सोने के बाद घर आता था क्युकी बहुत कठिन था ये सब
जिस चीज़ को मैं इतना चाहता था सहज ही वो मेरे पास आ गई और मुझे अपने हाथ से उसे खोना पड़ा। वो रोज मेरे सामने रहती है और रोज मुझे ये सब करना पड़ता है, मैं ये किसी को बता भी नहीं सकता था और छुपाना आसन नही है।
कई बार कई बात मुह में आ जाती थी पर फिर एक ख्याल और लम्बा अवसाद।
पर ये सब जरुरी लगा मुझे... सो मैंने किया।
अब यश तुझसे एक ही प्रार्थना है भाई वो तेरी बहन है पर मेरी भी बहन है प्लीज़ ख्याल रखना उसका। वरना मुझे बहुत बुरा लगेगा।
काश.....
जब मालूम है कोई चीज़ आपको बहुत पसंद हो, आपके आजू बाजु वाले सब के पास हो और वो आपको ना मिलने वाली हो तो किसी से बात करने का मन नही करता, चिडचिडापन आ जाता है, किसी का गुस्सा की और पर निकलता है, सब सुना सुना लगता है, सभी से जलन होती है, कोई अपना है ही नही ऐसा लगता है, सब स्वार्थी लगते है, आत्मविश्वास की धज्जियाँ उड़ जाती है, और जिस किसी के पास वो चीज़ हो वो दुश्मन लगता है।
कुछ ऐसा ही हाल है मेरा ।
मेरे जिंदगी में एक ही काश है काश मेरी बड़ी दीदी होती।
मेरा ममेरा भाई उसके पास ये सुख है पर वो जिस तरीके से उसके साथ व्यव्हार करता है सच बताऊ तो आत्मा जल जाती है।
पर जिंदगी आपको सब कुछ नही देती।
कुछ काश जिंदगी भर काश ही रह जाते हैं।
सारी दुनिया को मैं देंगा दिखाऊ
मुझे एक बड़ी बहन चाहिए जो सिर्फ मेरी हो..
जिसके साथ मैं हंसू खेलूं
जिसको मैं छेडू
जो मुझ पर गुस्सा करें
जिसको मैं सारी बातें बताऊ
वो मुझे ब्लैक मेल करें
फिर उसको मनाऊ
उससे अपना काम करवाऊ
बदले में रिश्वत देता जाऊ
बातें बातें करते करते
उसके गोद में सो जाऊ
वो कभी डांटे कभी प्यार से मारे
और मैं उसको देख मुस्कुराऊ
कभी कोई बात घर में ना बताने
के लिये मनाऊ
कभी तुझसे छुप के पिक्चर जाऊ
और आके तुझे बताऊ
अपने पहले क्रश के बारे में बताऊ
और तेरी मदद से उसको पटाऊँ
बस तू मिल जाये एक बार
और सारी दुनियां को मैं देंगा दिखाऊ
दीदी आज आप फिर बड़े हो गये...
आज मेरी दीदी का जन्मदिन है, तो ये चिठ्ठा उनके लिए...
युं तो आज के पहले आपके बहुत सारे जन्मदिन हो गये, कुछ साथ में भी मनाये । पर ये वाला कुछ अलग है।
इस बार अपन सिर्फ भाई बहन ना रहे इस बार इस रिश्ते में दोस्ती का तड़का लग गया था। अब की बार हममे थोडा प्यार, थोडा अपनापन, थोडी चिंता, थोडा गुस्सा, थोड़ी लड़ाई, थोडा डर और बहुत सारी मस्ती आ गई है तो बस आने वाले साल में या बचे हुए 4महीनों में आप थोडा और प्यार करो, थोडा ज्यादा ख्याल रखना,थोड़ी कम चिंता करना, मैं थोडा और गुस्सा दिलाऊंगा, अपन थोडा और लड़ेंगे मैं थोडा और डरूंगा और मस्ती... शायद वो बताने की जरुरत नही है।
अब सिर्फ एक feeling छुट गई है वो है जलन। अब के मैं थोडा और जलूँगा क्युकी आज फिर आप मुझसे बड़े हो गये...
बदला मैं था...
आज सबेरे जब उठा तो सब बदला बदला सा नज़र आया। सूरज की किरणे एसी लग रही थी मानो मस्ती कर रही हों। रूम बिस्तर अलमारी घर गाड़ी सब कुछ बदल से गये थे, ऐसा लग रहा की एक नयी दुनिया में पहुँच गया हूं जो दिखने में तो हु बहु वैसी ही है पर यहाँ फीलिंग कुछ और ही है।
फिर मैंने बहुत सोचा की ये सब एसे क्यों हो गये? और आखिर में मैंने पाया बदले ये सब नही थे बदला मैं था मेरा नजरिया बदला था।
बदला मैं था.....
शंकेश्वर के ४दिन
१८/१२/२०१३ को मैं अपने परिवारजनों दादा, दादी, चाची, भैया लब्धि , समृद्धि और वंदन के साथ शंखेश्वर के लिए निकला हूँ। हमारे साथ दादी के भैया भाभी भी है।
१९ को सबेरे हम विरामगाँव पहुचे वहां गुजरात की राज्य परिवहन के कारण बहुत असुविधा हुई।
पर हम शंखेश्वर पहुच गए।
वहा साध्वी श्री हंसकीर्ति महाराज की ३००वीं(१००+१००+१००) के परना निमित्त पंचान्हिका महोत्सव था।
महोत्सव में आनंद बढ़िया आया। ४दिन मज़े में बीत गए आज हम वापस घर जा रहे है।